Thursday, August 30, 2012

हम क्यों लड़ रहे है?

Why are we fighting?

हम एक ही देश के निवासी है।फिर भी हिन्दू मुस्लिम आपस में क्यों लड़ रहे है?क्या एक हिन्दू जिस खेत का अनाज खाता है तो मुस्लिम उस खेत का अनाज खाना छोड़ देता है?क्या एक मुस्लिम जिस दुकान या शोरुम से कपडे लाता है तो हिन्दू उस दुकान या शोरुम से कपडे लाना छोड़ देता है?तो फिर हम क्यों लड़ रहे है?इस बात का सही तरीके से जवाब किसी के पास नहीं है।आपस में लड़ना तो इन्सान की प्रकर्ति है।हम पुरे देश की बात नहीं लेते एक परिवार की बात लेते है।परिवार में एक अगर दो भाई है तो वो भी छोटी-छोटी बातों में एक-दुसरे से लड़ते है।पडोसी है तो वो भी आपस में बैर रखते है।एक गाँव दुसरे गाँव से आगे निकलने में लगा रहता है।गाँव से बाहर निकलकर शहर की तरफ आइये एक शहर के लोग दुसरे शहर को देखकर यही सोचते है की फलाने शहर में ये सुविधा है हमारे शहर में क्यों नहीं,एक देश के लोग दुसरे देश के लोगो से बेर रखते है।लड़ाई का महत्वपूर्ण कारण है बेसब्री,अगर आदमी सब्र करने लग जाये तो में गारंटी देता हूँ की लड़ाई दंगे फसाद नहीं होंगे।
       लड़ाई का दूसरा कारण है लालच,एक कहावत भी है सबने सुन ही राखी होंगी की"लालच बुरी बला है" जो व्यक्ति लालच करता है जाहिर सी बात है वो बेसब्र भी होगा।लालच आदमी को अन्धकार की कगार पर ले जाती है,उसका विनाश कर देती ही है।आपने वो ''ए राजा'' का मामला तो सुन ही रखा होगा उसने अधिक से अधिक पैसे कमाने के लिए घोटाले पे घोटाले किये आज वो जैल की सलाखों के पीछे है।इसलिए में तो कहता हु भाई सब्र करो सब्र का फल मीठा होता है।हदीस और कुरआन में भी सब्र करने की हिदायत दी गयी।
किस्मत में जो होता है वो मिलकर ही रहता है,,,,किसी ने कहा है की "वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं मिलाता''
अल्लाह पाक ने जो दिया है उसमे सब्र करो और उससे दुआ करते रहो क्योकि वो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है।जो इन्सान अल्लाह से मांगता है अल्लाह उन्हें कभी निराश नहीं करता।अल्लाह से मांगो पर नेकी की रह मत छोड़ो हमेशा दुसरो की मदद करो।अल्लाह तुम्हे और हमें खूब देगा।आमीन 

Wednesday, August 29, 2012

अन्याय के खिलाफ

इस्लाम एक एसा धर्म हे जहाँ सिर्फ एक ही इश्वर (अल्लाह ) माबूद पैदा करने वाला संसार बनाने वाला मन जाता है।इसबात में कोई शक भी नहीं है।मानवता को इस्लाम में बहुत बड़ा दर्जा दिया गया है।हमें हमारा जीवन भी यही सिखाता है।एक मनुष्य को दुसरे मनुष्य की मदद करेगा तब ही वह जन्नत का असली हक़दार है।''नबी ए अकरम हुजुर नबी ए करीम सल्लल्लाहु तआला अलेयही वसल्लम''ने मानवता को बचाने के लिए अपने प्यारे नवासो हसनोहुसेन को शहीद होने दिया वो चाहते तो क्या कुछ नहीं कर सकते थे जिन्होंने चाँद के दो टुकड़े कर दिए वो तो एक ऊँगली के इशारे पर विद्रोहियों की सेनाओं को नेस्तोनाबूद कर सकते थे।उधर बेईमानो की हजारों की तादाद में सेनाएं यहाँ अपने इमान पर मर मिटने वालों की तादाद सिर्फ 40 पर हसन हुसैन तथा उनके साथियों ने डट कर मुकाबला किया और वाही मैदाने जंग में लड़ते लड़ते शहीद हो गए।पर वो शहीद हुए तो सिर्फ अल्लाह की मर्जी से और आज उनकी ही बदोलत हे की इस्लाम आज पुरे संसार में फेल गया है।हुजुर (सा .ता .आले .वस् .)मानवता के सदेश को पुरे विश्व में फेलाया।
हमें भी उनकी बातों बातो पर अमल करना चाहिए।आज देखो पुरे संसार की हालत ख़राब है।एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से लड़ रहा है।अपने फायदे के लिए एक दुसरे को मर रहे है।हिन्दुस्थान में भी हालत बहुत ख़राब है।जगह-2 भ्रष्टाचार फेला हुआ है।आज सरकारी काम के लिए छोटी से छोटी बात हो पहले पैसो का जेब में होना बहुत जरुरी है।महंगाई दिन बार दिन बढती ही जा रही है पर सर्कार के पास इसका कोई तोड़ नहीं।महंगाई की मार क्यों हमेशा आम आदमी को सहनी पड़ती है।सर्कार अपनी सफाई देकर दूर हट जाती है।अगर एक आम आदमी को एक साईकिल भी लानी हो तो उसे दस बार सोचना पड़ता है।अगर कोई आदमी महीने में 5000/-भी कमाता हे तो वो अपने अपने परिवार के लिए पूंजी जमा नहीं कर सकता।पूंजी जमा करना तो दूर की बात है 5000/-में उसके एक महीने का परिवार का खर्चा भी नहीं चल पाता।''पैसे से पैसा बनता हे''ये कहावत सच होती हमें आज दिख रही है।जो आदमी गरीब है वह ओर गरीब होता जा रहा है और जो व्यक्ति पुन्जिवान है वह ओर आमिर होता जा रहा है।हमें ही देश की उन्नति के लिए कुछ करना होगा।
मेरी शपथ ..
  1. में कोई  भी गैरकानूनी कम नहीं करूँगा और न ही किसी का साथ दूंगा।
  2. अगर मेरी आंखो के सामने किसी के साथ अन्याय हो रहा है तो में उस अन्याय का पुरजोर विरोध करूँगा।
  3. अपना कम निकलवाने और और आगे रहने के लिए बेईमानी सहारा नहीं लूँगा।
  4. कोमी एकता को हमेशा ध्यान में रखुगा और दुसरो को  भी सही रह पर लाने का प्रयत्न करूँगा।
  5. अगर कोई व्यक्ति किसी एक संप्रदाय के खिलाफ बोलता है तो में उसका विरोध करूँगा।
  6. देशा का दुश्मन मेरा दुश्मन है।

अज़मते ख़ान ए काबा


इस दुनिया में ख़ुदा का पहला घर ख़ान ए काबा है। तारीख़े अतीक़ भी इस बात की गवाह है कि इससे क़ब्ल कोई एक भी ऐसी इबादत गाह कायनात में मौजूद नही थी जिसे ख़ुदा का घर कहा गया हो। इस की तसदीक़ क़ुरआने मजीद भी इन अल्फ़ाज़ में करता है:
(सूर ए आले इमरान आयत 96)
तर्जुमा: बेशक पहला घर जो लोगों की इबादत के लिये मुक़र्रर किया गया था वह यही है बक्का में, जो बा बरकत और सारे जहानों के लिये मुजिबे हिदायत है।
एक तारीख़ी रिवायत के मुताबिक़ ख़ान ए काबा बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदुल अक़सा से एक हज़ार तीन सौ साल पहले तामीर हुआ है।
असरे जाहिलियत में भी तमाम अरब अपने जाहिली रस्म व रिवाज के मुताबिक़ ख़ान ए काबा का तवाफ़ और हज किया करते थे।
हज़रत इब्राहीम (अ) ने हज़रत मूसा (अ) से नौ सौ बरस पहले इस की ज़ाहिरी तामीर मुकम्मल की और बारगाहे हक़ में दुआ की। यह दुआ क़ुरआने करीम में इस तरह बयान हुई है:
(सूर ए इब्राहीम आयत 37) परवरदिगारा, मैंने इस बे आबो गयाह वादी में अपनी औलाद को तेरे मोहतरम घर के पास ला बसाया है……।
हिजरत के अठठारवें महीने माहे शाबान सन 2 हिजरी में जंगे बद्र से एक माह पहले मुसलमानों के क़िबला बैतुल मुक़द्दस से मुन्तक़िल हो कर काबे की सिम्त हो गया। जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद के सूर ए बकरह में किया गया है।
ख़ुदा वंदे आलम का मुसलमानों पर बड़ा अहसान है कि उसने हमारा क़िबला ख़ान ए काबा क़रार दिया। चूँ कि बैतुल मुक़द्दस ऐसा क़िबला था जिस के कई दावेदार होने की वजह से कई बार काफ़िर फ़ातेहों ने उसे वीरान और नजिस किया और वहाँ के बसने वालों को कई बार ग़ुलाम बनान पड़ा और कई बार वहाँ क़त्ले आम भी जारी रहा, जो आज भी शिद्दत से हो रहा है और तारीख़ मुसलमानों के सुकूत पर महवे हैरत है।
यह एक बड़ी ताज्जुब ख़ेज़ बात है और तारीख़े आलम भी इस बात की गवाह है कि पिछले पाच हज़ार सालों में किसी ने भी ख़ान ए काबा पर अपनी ज़ाती मिल्कियत होने का दावा नही किया। यह ऐसा अनमोल शरफ़ है जो दुनिया की किसी इबादत गाह या मअबद को हासिल नही हुआ।
अरब के बुत परस्त भी उसे बैतुल्लाह ही कहा करते थे। इस्लाम से पहले भी उसकी हुरमत, हिफ़ाज़त, सियानत ख़ुदा मुतआल ने शरीफ़ नस्ल अरबों के ज़रिये फ़रमाई और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ज़रिये से मुसलमानों को क़यामत तक के लिये उसका मुहाफ़िज़ व पासबान बना दिया।
नबी करीम (स) की विदालते बा बरकत से एक महीने बीस रोज़ पहले जब यमन का बादशाह अबरहा अपनी साठ हज़ार हाथियों की मुसल्लह फ़ौज लेकर ख़ान ए काबा को ढाने की ग़रज़ से मक्के की वादियों में आया तो परवर दिगार ने अपने घर के हरीम की हिफ़ाज़त की ख़ातिर किसी इंसानी फ़ौज का सहारा नही लिया बल्कि अबाबीलों जैसे नाज़ुक अंदाम परिन्दों के ज़रिये उन हाथियों पर कंकड़ियाँ बरसा कर उन अफ़वाजे फ़ील को तहस नहस कर दिया। क़ुरआने करीम के सूर ए फ़ील में इसी वाक़ेया का ज़िक्र है।
जन्नत से ख़ास कर उतारे गये दो अहम पत्थर हजरे असवद और मक़ामे इब्राहीम, अहले आदम (अ) और दौरे इब्राहीमी से अब तक मौजूद हैं और दुनिया के सब से ज़्यादा मुक़द्दस पानी का क़दीम चश्मा ज़मज़म इसी ख़ान ए काबा के क़रीब है। इसके पानी के नेकों की शराब कहा गया है, लाखों अक़ीदत मंद मुसलमान दुनिया के गोशा व किनार से इस पानी को तबर्रुक के तौर पर ले जाते हैं।
मक्क ए मुअज़्ज़मा और फ़ज़ाएले ख़ान ए काबा में क़ुरआने हकीम की कई आयात नाज़िल हुई हैं। अल्लाह तआला ने शहरे मक्का को (उम्मुल क़ुरा) यानी बस्तियों का माँ कहा है और सूर ए अत तीन और सूर ए अल बलद में अल्लाह तआला ने इस शहरे पुर अम्न में की क़सम खाई है। इस शहर में यहाँ के शहरियों के अलावा, दूसरे तमाम लोगों को एहराम बाँधे बग़ैर दाख़िल होने की इजाज़त नही है। यह ख़ुसूसियत दुनिया के किसी और शहर को नसीब नही है। मस्जिदुल हराम की इबादत और यहाँ की हर नेकी अक़ताए आलम में की गई नेकियों से एक लाख गुना ज़्यादा बेहतर है। यह मक़ाम इस क़दर मोहतरम और पुर अम्न है कि यहाँ न सिर्फ़ ख़ूनरेज़ी मना है बल्कि न किसी जानवर का शिकार किया जा सकता है व किसी पेड़ को काटा और सबज़े और पौधे को उखाडा़ जा सकता है।
क़ुरआने पाक में उसे बैतुल हराम यानी शौकत का घर कहा गया है। ख़ान ए काबा के महल्ले वुक़ू के बारे में लिखा गया है कि यह ऐन अरशे इलाही और बैतुल मामूर के नीचे है। इल्मे जुग़राफ़िया के माहिरीन का कहना है कि काबे के महल्ले वुक़ू को हम नाफ़े ज़मीन कह सकते हैं।

Tuesday, August 28, 2012

हिन्दुस्तान की आजादी में इस्लाम का योगदान

हिन्दुस्तान की आजादी में इस्लाम का योगदान 

जो लोग ये सोचते हें की देश को आजाद करने के लिए मुसलमानों का कोई हाथ नहीं।पुरे हिंदुस्तान  को गैर मुस्लिमो ने हि आजाद कराया है , मे उन लोगो को इस्लाम के बलिदान के बारे बताता हूँ।
हिन्दुस्थान को आजाद कराने के लिए अगर किसी ने जिम्मा उठाया वो एक मुस्लिम था।नाम था मजनू शाह मलंगइन्होने अंग्रेजो के खिलाफ जंग का  एलान  सन-1761 में लड़ी  इस जंग 'उदुअनाला की जंग 'के नाम से जाना जाता है।इन्होने  'बक्सर  की जंग ' सन-1764 में लड़ी।
पर देश के ही कुछ महान  आदमियों ने उनके नाम को फाइलों में दबा दिया।
इसका यह नतीजा निकला की लोग उनके नाम को भूल चुके है। उनके बारे में बताने का कुछ पर्यत्न करता हूँ।
 मजनू शाह मलंग 
                        मजनू  शाह मलंग एक सन्यासी फकीर के रूप में जाना जाता है।
मजनू शाह मलंग का दूसरा नाम 'अबु तालिब 'था।उनके मलंग बनने के बाद लोग उन्हें मजनू मलंग तथा मजनू शाह बुरहान के नाम से जानने लगे।उनका मदारगंज में उनका अस्थाई निवास था।मजनू शाह बोगरा जिले बलियाकांदी में भी रहते थे।इन्होने सबसे पहले हिंदुस्तान को आजाद कराने जिम्मा उठाया।इन्होने कोमी एकता पर बल दिया।मजनू मलंग ने हिन्दू  सन्यासियों और मुस्लिम लोगों को इकट्टा किया और अंग्रेजो से लड़ने के लिए प्रेरित किया।जब साडी जनता इकट्ठी हो गयी तो उन्होंने मजनू शाह के नेतृत्व में जंग लड़ने का फेसला किया।उनका मुख्यालय कानपूर के पास मकनपुर में था।
25 फरवरी 1771 में इनकी जंग ब्रिटिस सरकार से हुई,उस समय ब्रिटिस सरकार का नेतृत्व लेफ्टिनेंट फेल्थम कर रहा था।यह जंग असफल रही। 
इनकी दूसरी जंग 23 दिसम्बर 1773 में हुइ।यह जंग भी असफल रही।
8 दिसम्बर 1786 की लड़ाई में मजनू शाह मलंग घायल हो गए।मजनू शाह मलंग इस जंग के बाद मकनपुर चले गए।माना जाता हे की 1787में मजनू शाह मलंग का इंतकाल हो गया।
उनके इंतकाल के बाद उनके भतीजे मुषा शाह ने उनकी जगह नेतृत्व किया।1792 में हुई अंग्रेजो के साथ जंग में वो सहीद हो गए।