Thursday, October 11, 2012

अनमोल मोती

अनमोल मोती 

(1)अगर मेरी एक भी बात तुमको मालूम हो तो दूसरो तक पहुँचा दो।(बुखारी शरीफ)
(2)तुम में से भला आदमी वो है जिसने कुरआन सिखा और उसे दुसरो को सिखाया।(बुखारी शरीफ )
(3)जो अपने भाई के काम आता है अल्लाह उसके काम आता है।(मुस्लिम शरीफ )रदियल्लाहो
(4)दो आदते मोमिन में इकठ्ठा नहीं होती,एक कंजूसी दूसरी बदमिजाजी।(तिर्मिजी शरीफ)
(5)जालिमो के साथ रहना भी एक जुर्म है।(हजरत इमाम हुसैन रदियल्लाहो ताला अन्हो)
(6)सच्चे आदमी का थोडा सा माल झूटे की बहुत सी दोलत से बेहतर है।(हजरत दाउद अलेय्हिस्सलाम )
(7) जिल्लत की जिंदगी से इज्जत की मोत बेहतर है।(हजरत इमाम हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हो)
(8)अगर आँखे रोशन है तो हर रोज रोज़े महशर है।(हजरत उस्मान गनी रदियल्लाहो अन्हो)
(9)हर शख्स सच्चा दोस्त तलाश करता है,मगर खुद सच्चा दोस्त बनने की ज़ेहमत गवारा नहीं करता।(हाकिम लुकमान )

Tuesday, October 9, 2012

अभी भी कुछ बाकि है।

अभी भी कुछ बाकि है।

ये बात बिलकुल सही है की इंडिया एक महान देश है।में इस देश की धरती पर जन्म  ले कर अपने आप को गोरवान्वित   हूँ। यहाँ पर कई वली आये।दुनिया को सच्चाई की  दिखाई।पर लोग इस देश कि महानता को बुल रहे है।खास कर के नेता।ये लोग इंडिया को  लूट रहे है।नेता कोन है इस देश के  नोकर और देश जनता से  मिलकर बना है।इस बात के माध्यम से तो नेता हमारे नोकर हुए।सोचिए एक नोकर मालिक को लूट रहा है।कितनी शर्म की बात है हमारे लिए।अगर हम चाहे तो  कुछ नहीं कर सकते।मालिक होने के तहत हमारा ये हक़ बनता है की नोकरो को  सबक  सिखाया जाए।आज के दोर में  आप की नेता की साइड नहीं ले सकते .क्योंकि ये  के सांप होते है।

Saturday, September 8, 2012

Be human.

इन्सान बनो
इन्सान बनना को छोटी बात नहीं और न ही कोई बड़ी बात है।आजकल ज्यादातर आदमी मशहूर होने के लिए गलत रुख इक्तियार कर लेते है।वो आदमी गलत कम करने से पहले ये नहीं सोचता की उसे अल्लाह के पास जवाब देना है।
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे, 
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला.

लोग दुनियावी बातो में इतने खो जाते है की उन्हें आखिरत का कोई खयाल ही नहीं रहता।लोगो के लिए रूपये ही सब कुछ हो गए है।लोग जाती मजहब धर्म के नाम पर एक दुसरे से लड़ते है।उन्हें ये सब करके क्या मिलाता है।खून दोनों ओर से बहता है।फिर भी लोगो को कुछ हांसिल नहीं होता।दोनों और से लोग अपनी सत्ता को ऊँची रखने की होड़ में लगे रहते है।हर धर्म या मजहब में ये लिखा हुआ है की हर इन्सान को दुसरे इन्सान की मदद करनी चाहिए।उनमे ये कहाँ लिखा हुआ है की एक मुस्लिम को सिर्फ मुस्लिम की ही मदद करनी चाहिए या एक हिन्दू को सिर्फ एक हिन्दू की ही एक सिक्ख को सिर्फ एक सिक्ख की ही या फिर एक इसाई को सिर्फ इसाई की ही मदद करनी चाहिए।में मानता हूँ की सभी लोग ऐसे नहीं है।हदीस में लिखा है की हमें किसी बुरी बात में किसी का साथ नहीं देना चाहिए।अगर कही कोई बुरा काम हो रहा है तो हमें उनके खिलाफ बोलना चाहिए अगर बुरा काम करने वाला हमसे ज्यादा ताकतवर हे तो हम उस बुरे काम को अपने दिल में बुरा मान सकते हे इससे उस काम का अजाब हम पर नहीं पड़ेगा।पर जहाँ तक हो सके उस बुरे काम को रोकने का प्रयास करे।इंसानियत का सन्देश घर घर में पंहुचाना ही हमारा पहला कृतव्य होना चाहिए।हिंदुस्तान जिन्दाबाद

Sunday, September 2, 2012

JANNAT & JAHANNAM


यह सवाल हमेशा से इंसान को परेशान करता रहा है। दुनिया का हर मज़हब मौत के बाद जिंदगी का यकीन दिलाता है जबकि मज़हब से इतर लोगों का मानना है कि मौत के बाद जिस्म सड़ गल कर मिट्‌टी हो जाता है और उसके बाद दूसरी जिंदगी का सवाल ही नहीं उठता। 
इस्लाम इसका यकीन दिलाता है कि मौत के बाद जिंदगी है, और एक फैसले का दिन (कयामत) मुकर्रर है, उस दिन हर शख्स के आमाल देखे जायेंगे। वहाँ नेक अमल करने वालों के लिये अच्छी जगह यानि जन्नत व बुरे काम करने वालों के लिये बुरी जगह यानि जहन्नुम है।
कैसी होगी जन्नत या कैसा होगा जहन्नुम? इस बारे में हम कोई कल्पना नहीं कर सकते। इसलिये कि मौत के बाद की सारी चीजें इस दुनिया से पूरी तरह अलग होंगी। मिसाल के तौर पर दुनिया की आग आम तौर पर लाल और ज्यादा से ज्यादा सफेद होती है। लेकिन जहन्नुम की आग काले रंग की है। हम बस इतना समझ सकते हैं कि जन्नत इस दुनिया से इतनी बेहतर होगी और जहन्नुम इस दुनिया से इतना बदतर होगा जितना हम सोच ही नहीं सकते।
कयामत के दिन मैदान-ए-हश्र (जहाँ लोगों का फैसला होगा) की तरफ जहन्नुम को लाया जायेगा और उसके ऊपर एक पुल कायम किया जायेगा। जिसे पुले सिरात कहते हैं। उस पुल के ऊपर से हर व्यक्ति को गुजरना होगा। जो हक पर होंगे और जिनके कर्म अच्छे होगे वो उस पुल से गुजर कर जन्नत में दाखिल हो जायेंगे। और बुरे कर्म वाले बीच ही में गिर कर जहन्नुम की आग में घिर जायेंगे।
अब यहाँ कुछ सवाल लोगों के ज़हन में पैदा होते हैं।
1- जन्नत और जहन्नुम का फैसला मौत के बाद क्यों? इसी जिंदगी में क्यों नहीं? जिससे कि उसे देखकर दूसरे लोग सुधर जायें।
दरअसल अल्लाह बुरे इंसान को आखिरी साँस तक सुधरने का मौका देता है ताकि वह तौबा करके अच्छा इंसान बन जाये और उसके गुनाह माफ हो जायें। इसलिये इस जिंदगी में उसे कोई सजा नहीं दी जाती। इसी तरह मौत से पहले अगर उसे उसकी नेकियों का बदला मिल जाये तो बाद में जो वह नेकियां करेगा? उसका बदला उसे कैसे मिलेगा? कुछ नेकियां ऐसी भी होती हैं जिनका बदला इंसान को मरने के बाद भी मिलता रहता है। अगर किसी व्यक्ति ने किसी रेगिस्तानी इलाके में कुएं का निर्माण कराया है तो जब तक लोग उस कुएं से अपनी प्यास बुझाते रहेंगे, उसे इस नेकी का सवाब मिलता रहेगा। इसी तरह अगर उसकी औलाद में से किसी ने कोई अच्छा काम इस नीयत के साथ किसा कि उसका सवाब उसके माँ बाप को मिले तो ये नेकी भी उसके माँ बाप को मिलेगी। इसीलिये अल्लाह ने फैसले का वक्त कयामत के रोज का रखा है जब यह पृथ्वी व सूर्य सभी खत्म हो जायेंगे। उस वक्त नेकी या बदी के सारे एकाउंट बन्द हो जायेंगे।    
2- जन्नत और जहन्नुम का फैसला कयामत के दिन किया जायेगा। जब यह दुनिया खत्म हो जायेगी। तो सवाल ये है कि कयामत शायद लाखों साल बाद आने वाली है। तो अभी से उसकी फिक्र क्यों? और मौत के बाद इन लाखों सालों में इंसान की रूह अर्थात आत्मा क्या कर रही होगी? इस दौरान क्या वह सोयी हुई है या किसी और दुनिया में है?
ऐसा भी नहीं है कि सारे फैसले कयामत के ही रोज होंगे। जैसे ही किसी शख्स की मृत्यु होती है तो उसकी आत्मा एक दूसरे लोक में पहुंच जाती है जिसे बरज़ख का नाम दिया गया है। इस लोक में भी कयामत की ही तरह अच्छे लोगों के लिये जन्नत के मिस्ल अच्छी चीजें हैं और बुरे लोगों के लिये बुरी चीजें।    
बरज़ख की तरफ कुरआनी आयतों में कुछ इस तरह जिक्र आया है :
40.46 और अब तो कब्र में दोज़ख की आग है, कि वह लोग सुबह और शाम उसके सामने ला खड़े किये जाते हैं। और जिस दिन क़यामत बरपा होगी, (हुक्म होगा) फिरऔन के लोगों को सख्त से सख्त अजाब में झोंक दो।
यहां पर दोजख की आग बरज़ख में है इसलिये क्योंकि कयामत के दिन रात और दिन का मामला खत्म हो जायेगा। कयामत में न यह जमीन बाकी रहेगी न आसमान। 
11.106-108 तो जो लोग बदबख्त हैं वह दोज़ख में होंगे और उसी में उनकी हाय व चीख पुकार होगी। वह लोग जब तक आसमान व ज़मीन में हैं, हमेशा उसी में रहेंगे मगर जब तुम्हारा परवरदिगार चाहे। बेशक तुम्हारा परवरदिगार जो चाहता है कर ही डालता है।
चूंकि कयामत में न यह जमीन बाकी रहेगी न आसमान तो यह आयत बरजख की बात कर रही है। और जो लोग नेकबख्त हैं वह तो बहिश्त में होंगे जब तक आसमान व ज़मीन है वह हमेशा उसी में रहेंगे मगर जब तुम्हारा परवरदिगार चाहे।
यहाँ ये भी साफ हो रहा है कि जिन लोगों के गुनाह बरजख की आग में खत्म हो जायेगे वह कयामत के दिन जन्नत में भेज दिये जायेगे। और इसका उल्टा भी मुमकिन है। 
36. 25-26 मैं तो तुम्हारे परवरदिगार पर ईमान ला चुका हूं। मेरी बात सुनो और मानो। मगर उन लोगो ने उसे संगसार कर डाला। तब उसे अल्लाह का हुक्म हुआ कि बहिश्त में जा।
इस आयत में भी बरज़खी बहिश्त (जन्नत) की बात हो रही है। 
इस तरह की कई आयतें बरज़ख की बात करती हैं। बरजख मौत के बाद रूहों का घर है। 
किताबों में बरजख के दो हिस्से बताये गये हैं : (1) वादियुस्सलाम (सलामती की वादी) यहाँ अच्छी रूहें आराम से रहती हैं। और (2) वादिये बरहूत (भयानक वादी) यहाँ बुरी तकलीफ के साथ रूहें रहती हैं।
अगर कोई अच्छा व्यक्ति गुमराही का मौत मर गया। यानि उसे किसी ने सही रास्ता बताया ही नहीं। तो उसके लिये बरज़ख एक चाँस भी देता है कि कयामत के लिये अपने को सही राह पर लगा ले।
बरज़ख में बलात्कारी की सजा : किताबों में है कि अगर कोई व्यक्ति बलात्कार करता है तो उसकी कब्र में अजाब के तीन सौ दरवाजे खुल जाते हैं। हर दरवाजे से आग के साँप और बिच्छू बरामद होते हैं और वह कयामत तक जलता रहता है।
बरजख सिर्फ आत्मा के लिये है। पदार्थिक जिस्म से उसका कोई ताल्लुक नहीं है। बरजख में आत्मा को एक काल्पनिक जिस्म उसी तरह मिल जाता है जैसे कि सपने में होता है। जबकि कयामत का ताल्लुक जिस्म और आत्मा दोनों के लिये है। कयामत में इंसान का जिस्म उसी नुक्ते से दोबारा पैदा किया जायेगा जिस नुक्ते से पहली बार पैदा किया गया। और फिर उस जिस्म को उसकी आत्मा के साथ जोड़ दिया जायेगा।   
कयामत के दिन इंसान के होंठ सिल जायेंगे और हाथ पैर गवाही देंगे। कि उस इंसान ने पूरी जिंदगी कैसे कर्म किये। उस दिन हर व्यक्ति को हर उस व्यक्ति को बदला देना पड़ेगा जिसका हक उसने इस दुनिया में मारा था। यह बदला उसे अपनी नेकियों में से देना होगा।
अब एक सवाल और उठता है अल्लाह ने जन्नत और जहन्नुम बनाया ही क्यों? वह इंसान को भी फरिश्तों की तरह पैदा कर सकता था, जिनमें सिर्फ नेकी और अल्लाह की इबादत का ही विचार आता है। और बुरे विचारों से ये लोग दूर रहते हैं।
इसका जवाब ये है कि अल्लाह ने पहले जिन्नातों को बनाया और फिर इंसान को पैदा करने का इरादा किया। इंसान एक ऐसी मखलूक, जिसमें अच्छाई और बुराई के बारे में सोचने की ताकत हो। और जो अपने कर्मों को आजादी के साथ कर सकता हो। अल्लाह के इल्म से जिन्नातों और फरिश्तों को मालूम था कि इंसान का मिजाज क्या है। इसलिये जब अल्लाह ने कहा कि ज़मीन का मालिक इंसानों में से ही होगा तो इन लोगों ने एतराज जताया कि इंसान जमीन पर हमेशा तबाही और मारकाट मचाता रहेगा। ऐसे को जमीन का मालिक बनाना क्या उचित है? जवाब में अल्लाह ने कहा कि अपनी कमजोरियों के बावजूद वह अपने ज्ञान की वजह से तुम सबसे बेहतर है। सब ने अल्लाह के फैसले पर सर झुका दिया सिवाय इबलीस के जिसने अल्लाह के फैसले के बावजूद इंसान को अपने से नीचा समझा। उसने यह ठान लिया कि इंसान को नीचा दिखाने की हर मुमकिन कोशिश करेगा। उसकी सरकशी के लिये अल्लाह ने जहन्नुम की पैदाइश की और फिर उसकी न्यायप्रियता ने इबलीस को भी इतनी आजादी दे दी कि जिसको भी बहकाने में वह कामयाब हो जायेगा वह इंसान भी उसी के साथ जहन्नुम में भेज दिया जायेगा। इसलिये अब जो इंसान इबलीस के बहकाने में न आकर अपने को उससे बेहतर बना देता है उसके लिये जन्नत है और जो अपने को इबलीस से बदतर बना देता है उसके लिये जहन्नुम है। हर बेहतर इंसान अल्लाह के फैसले पर सहमति की मुहर लगाता है। और हर बदतर इंसान इबलीस के एतराज के लिये नया सुबूत बन जाता है। अब हमारे लिये यह फैसला करना है कि बेहतर बनकर अल्लाह के फैसले से सहमति दिखानी है और जन्नत में जाना है या बदतर बनकर इबलीस को और ज्यादा हंसने का मौका देना है और उसके साथ जहन्नुम में रहना है?
पुनश्च : सभी इंसान ज़मीन के मालिक नहीं हैं. हदीसों के अनुसार ज़मीन के मालिक मुहम्मद (स.अ.) व आले मुहम्मद हैं.

ज़िन्दगी का सफ़र

 मुंबई पर हमला हुआ दिल्ली ,जयपुर ,अजमेर ,एर इसी कई जगहों पर आतंकवादी हमले हुए।सेकड़ो इन्सान मारे गए।पर क्या इन हमलो में सिर्फ हिन्दू ही मरे गए या फिर सिर्फ मुस्लिम ही मारे गए।तो फिर लोग क्यों एक दुसरे पर इलज़ाम लगते है।में एक मुस्लिम हूँ इसके साथ साथ में एक हिन्दुस्तानी भी हूँ।मेने अपने मुल्क से गद्दारी करने के बारे में कभी नहीं सोचा।मुझे ये सब सोचने से पहले मोत अपनी आगोश में ले ले तो में बेहतर मानूंगा।में चाहता हूँ ये होसला हर मुसलमान के दिल में हो ,अगर वो सच्चा मुसलमान  है तो उसके दिल में अपने वतन से पयार जरुर होगा क्योंकि कुरआन शरीफ में भी अपने वतन से प्यार करने और उन पर मर मिट जाने की हिदायत देता है।
में उन लोगो से खफा हूँ जो हमारे दिल को ठेस पहुंचाते है,हमारे दिल जो वतन के लिए देशभक्ति की भावना है उसे मिटाने का एक असफल प्रयास करते है।पर उनके इन प्रयासों से हमारा होंसला और बुलंद होता है।जिन्हें पाकिस्थान जाना था वो सन 1947 को ही पाकिस्तान चले गए पर कुछ मुट्ठी भर लोग हमें हमें क्यों जाने के लिए उकसाते है।जब इंडिया पाकिस्तान से मेच जीतता है तो हमें भी उतनी ही ख़ुशी होती है जीतनी की आपको  और पुरे हिंदुस्तान को पर क्यों वो पटाके हमारे घर के बाहर ही आकर जलाते है ढोल हमारे घर के बाहर ही आकर क्यों बजाते है।मुझे समझ नहीं आता वो हमें समझते क्या है।पर वो जो भी समझते है हमें बहुत बुरा लगता है।इन्टरनेट पर ब्लॉग के बहाने वो क्यों मुस्लिम पर कीचड़ उछालते है।कुरान और हदीस पर गलत कमेन्ट करने वालो से में कहना चाहता हूँ की पहले वो अपने धर्म के ग्रंथो का अच्छी तरह से अध्ययन करे।जब उनको अपने धर्मो का पूरी तरह से अध्ययन कर ले तो फिर अपने धर्मो की अच्छाईया लोगो तक पहुँचाए दुसरो के धर्म पर कमेन्ट ना करें।धन्यवाद

Thursday, August 30, 2012

हम क्यों लड़ रहे है?

Why are we fighting?

हम एक ही देश के निवासी है।फिर भी हिन्दू मुस्लिम आपस में क्यों लड़ रहे है?क्या एक हिन्दू जिस खेत का अनाज खाता है तो मुस्लिम उस खेत का अनाज खाना छोड़ देता है?क्या एक मुस्लिम जिस दुकान या शोरुम से कपडे लाता है तो हिन्दू उस दुकान या शोरुम से कपडे लाना छोड़ देता है?तो फिर हम क्यों लड़ रहे है?इस बात का सही तरीके से जवाब किसी के पास नहीं है।आपस में लड़ना तो इन्सान की प्रकर्ति है।हम पुरे देश की बात नहीं लेते एक परिवार की बात लेते है।परिवार में एक अगर दो भाई है तो वो भी छोटी-छोटी बातों में एक-दुसरे से लड़ते है।पडोसी है तो वो भी आपस में बैर रखते है।एक गाँव दुसरे गाँव से आगे निकलने में लगा रहता है।गाँव से बाहर निकलकर शहर की तरफ आइये एक शहर के लोग दुसरे शहर को देखकर यही सोचते है की फलाने शहर में ये सुविधा है हमारे शहर में क्यों नहीं,एक देश के लोग दुसरे देश के लोगो से बेर रखते है।लड़ाई का महत्वपूर्ण कारण है बेसब्री,अगर आदमी सब्र करने लग जाये तो में गारंटी देता हूँ की लड़ाई दंगे फसाद नहीं होंगे।
       लड़ाई का दूसरा कारण है लालच,एक कहावत भी है सबने सुन ही राखी होंगी की"लालच बुरी बला है" जो व्यक्ति लालच करता है जाहिर सी बात है वो बेसब्र भी होगा।लालच आदमी को अन्धकार की कगार पर ले जाती है,उसका विनाश कर देती ही है।आपने वो ''ए राजा'' का मामला तो सुन ही रखा होगा उसने अधिक से अधिक पैसे कमाने के लिए घोटाले पे घोटाले किये आज वो जैल की सलाखों के पीछे है।इसलिए में तो कहता हु भाई सब्र करो सब्र का फल मीठा होता है।हदीस और कुरआन में भी सब्र करने की हिदायत दी गयी।
किस्मत में जो होता है वो मिलकर ही रहता है,,,,किसी ने कहा है की "वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं मिलाता''
अल्लाह पाक ने जो दिया है उसमे सब्र करो और उससे दुआ करते रहो क्योकि वो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है।जो इन्सान अल्लाह से मांगता है अल्लाह उन्हें कभी निराश नहीं करता।अल्लाह से मांगो पर नेकी की रह मत छोड़ो हमेशा दुसरो की मदद करो।अल्लाह तुम्हे और हमें खूब देगा।आमीन 

Wednesday, August 29, 2012

अन्याय के खिलाफ

इस्लाम एक एसा धर्म हे जहाँ सिर्फ एक ही इश्वर (अल्लाह ) माबूद पैदा करने वाला संसार बनाने वाला मन जाता है।इसबात में कोई शक भी नहीं है।मानवता को इस्लाम में बहुत बड़ा दर्जा दिया गया है।हमें हमारा जीवन भी यही सिखाता है।एक मनुष्य को दुसरे मनुष्य की मदद करेगा तब ही वह जन्नत का असली हक़दार है।''नबी ए अकरम हुजुर नबी ए करीम सल्लल्लाहु तआला अलेयही वसल्लम''ने मानवता को बचाने के लिए अपने प्यारे नवासो हसनोहुसेन को शहीद होने दिया वो चाहते तो क्या कुछ नहीं कर सकते थे जिन्होंने चाँद के दो टुकड़े कर दिए वो तो एक ऊँगली के इशारे पर विद्रोहियों की सेनाओं को नेस्तोनाबूद कर सकते थे।उधर बेईमानो की हजारों की तादाद में सेनाएं यहाँ अपने इमान पर मर मिटने वालों की तादाद सिर्फ 40 पर हसन हुसैन तथा उनके साथियों ने डट कर मुकाबला किया और वाही मैदाने जंग में लड़ते लड़ते शहीद हो गए।पर वो शहीद हुए तो सिर्फ अल्लाह की मर्जी से और आज उनकी ही बदोलत हे की इस्लाम आज पुरे संसार में फेल गया है।हुजुर (सा .ता .आले .वस् .)मानवता के सदेश को पुरे विश्व में फेलाया।
हमें भी उनकी बातों बातो पर अमल करना चाहिए।आज देखो पुरे संसार की हालत ख़राब है।एक व्यक्ति दुसरे व्यक्ति से लड़ रहा है।अपने फायदे के लिए एक दुसरे को मर रहे है।हिन्दुस्थान में भी हालत बहुत ख़राब है।जगह-2 भ्रष्टाचार फेला हुआ है।आज सरकारी काम के लिए छोटी से छोटी बात हो पहले पैसो का जेब में होना बहुत जरुरी है।महंगाई दिन बार दिन बढती ही जा रही है पर सर्कार के पास इसका कोई तोड़ नहीं।महंगाई की मार क्यों हमेशा आम आदमी को सहनी पड़ती है।सर्कार अपनी सफाई देकर दूर हट जाती है।अगर एक आम आदमी को एक साईकिल भी लानी हो तो उसे दस बार सोचना पड़ता है।अगर कोई आदमी महीने में 5000/-भी कमाता हे तो वो अपने अपने परिवार के लिए पूंजी जमा नहीं कर सकता।पूंजी जमा करना तो दूर की बात है 5000/-में उसके एक महीने का परिवार का खर्चा भी नहीं चल पाता।''पैसे से पैसा बनता हे''ये कहावत सच होती हमें आज दिख रही है।जो आदमी गरीब है वह ओर गरीब होता जा रहा है और जो व्यक्ति पुन्जिवान है वह ओर आमिर होता जा रहा है।हमें ही देश की उन्नति के लिए कुछ करना होगा।
मेरी शपथ ..
  1. में कोई  भी गैरकानूनी कम नहीं करूँगा और न ही किसी का साथ दूंगा।
  2. अगर मेरी आंखो के सामने किसी के साथ अन्याय हो रहा है तो में उस अन्याय का पुरजोर विरोध करूँगा।
  3. अपना कम निकलवाने और और आगे रहने के लिए बेईमानी सहारा नहीं लूँगा।
  4. कोमी एकता को हमेशा ध्यान में रखुगा और दुसरो को  भी सही रह पर लाने का प्रयत्न करूँगा।
  5. अगर कोई व्यक्ति किसी एक संप्रदाय के खिलाफ बोलता है तो में उसका विरोध करूँगा।
  6. देशा का दुश्मन मेरा दुश्मन है।

अज़मते ख़ान ए काबा


इस दुनिया में ख़ुदा का पहला घर ख़ान ए काबा है। तारीख़े अतीक़ भी इस बात की गवाह है कि इससे क़ब्ल कोई एक भी ऐसी इबादत गाह कायनात में मौजूद नही थी जिसे ख़ुदा का घर कहा गया हो। इस की तसदीक़ क़ुरआने मजीद भी इन अल्फ़ाज़ में करता है:
(सूर ए आले इमरान आयत 96)
तर्जुमा: बेशक पहला घर जो लोगों की इबादत के लिये मुक़र्रर किया गया था वह यही है बक्का में, जो बा बरकत और सारे जहानों के लिये मुजिबे हिदायत है।
एक तारीख़ी रिवायत के मुताबिक़ ख़ान ए काबा बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदुल अक़सा से एक हज़ार तीन सौ साल पहले तामीर हुआ है।
असरे जाहिलियत में भी तमाम अरब अपने जाहिली रस्म व रिवाज के मुताबिक़ ख़ान ए काबा का तवाफ़ और हज किया करते थे।
हज़रत इब्राहीम (अ) ने हज़रत मूसा (अ) से नौ सौ बरस पहले इस की ज़ाहिरी तामीर मुकम्मल की और बारगाहे हक़ में दुआ की। यह दुआ क़ुरआने करीम में इस तरह बयान हुई है:
(सूर ए इब्राहीम आयत 37) परवरदिगारा, मैंने इस बे आबो गयाह वादी में अपनी औलाद को तेरे मोहतरम घर के पास ला बसाया है……।
हिजरत के अठठारवें महीने माहे शाबान सन 2 हिजरी में जंगे बद्र से एक माह पहले मुसलमानों के क़िबला बैतुल मुक़द्दस से मुन्तक़िल हो कर काबे की सिम्त हो गया। जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद के सूर ए बकरह में किया गया है।
ख़ुदा वंदे आलम का मुसलमानों पर बड़ा अहसान है कि उसने हमारा क़िबला ख़ान ए काबा क़रार दिया। चूँ कि बैतुल मुक़द्दस ऐसा क़िबला था जिस के कई दावेदार होने की वजह से कई बार काफ़िर फ़ातेहों ने उसे वीरान और नजिस किया और वहाँ के बसने वालों को कई बार ग़ुलाम बनान पड़ा और कई बार वहाँ क़त्ले आम भी जारी रहा, जो आज भी शिद्दत से हो रहा है और तारीख़ मुसलमानों के सुकूत पर महवे हैरत है।
यह एक बड़ी ताज्जुब ख़ेज़ बात है और तारीख़े आलम भी इस बात की गवाह है कि पिछले पाच हज़ार सालों में किसी ने भी ख़ान ए काबा पर अपनी ज़ाती मिल्कियत होने का दावा नही किया। यह ऐसा अनमोल शरफ़ है जो दुनिया की किसी इबादत गाह या मअबद को हासिल नही हुआ।
अरब के बुत परस्त भी उसे बैतुल्लाह ही कहा करते थे। इस्लाम से पहले भी उसकी हुरमत, हिफ़ाज़त, सियानत ख़ुदा मुतआल ने शरीफ़ नस्ल अरबों के ज़रिये फ़रमाई और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ज़रिये से मुसलमानों को क़यामत तक के लिये उसका मुहाफ़िज़ व पासबान बना दिया।
नबी करीम (स) की विदालते बा बरकत से एक महीने बीस रोज़ पहले जब यमन का बादशाह अबरहा अपनी साठ हज़ार हाथियों की मुसल्लह फ़ौज लेकर ख़ान ए काबा को ढाने की ग़रज़ से मक्के की वादियों में आया तो परवर दिगार ने अपने घर के हरीम की हिफ़ाज़त की ख़ातिर किसी इंसानी फ़ौज का सहारा नही लिया बल्कि अबाबीलों जैसे नाज़ुक अंदाम परिन्दों के ज़रिये उन हाथियों पर कंकड़ियाँ बरसा कर उन अफ़वाजे फ़ील को तहस नहस कर दिया। क़ुरआने करीम के सूर ए फ़ील में इसी वाक़ेया का ज़िक्र है।
जन्नत से ख़ास कर उतारे गये दो अहम पत्थर हजरे असवद और मक़ामे इब्राहीम, अहले आदम (अ) और दौरे इब्राहीमी से अब तक मौजूद हैं और दुनिया के सब से ज़्यादा मुक़द्दस पानी का क़दीम चश्मा ज़मज़म इसी ख़ान ए काबा के क़रीब है। इसके पानी के नेकों की शराब कहा गया है, लाखों अक़ीदत मंद मुसलमान दुनिया के गोशा व किनार से इस पानी को तबर्रुक के तौर पर ले जाते हैं।
मक्क ए मुअज़्ज़मा और फ़ज़ाएले ख़ान ए काबा में क़ुरआने हकीम की कई आयात नाज़िल हुई हैं। अल्लाह तआला ने शहरे मक्का को (उम्मुल क़ुरा) यानी बस्तियों का माँ कहा है और सूर ए अत तीन और सूर ए अल बलद में अल्लाह तआला ने इस शहरे पुर अम्न में की क़सम खाई है। इस शहर में यहाँ के शहरियों के अलावा, दूसरे तमाम लोगों को एहराम बाँधे बग़ैर दाख़िल होने की इजाज़त नही है। यह ख़ुसूसियत दुनिया के किसी और शहर को नसीब नही है। मस्जिदुल हराम की इबादत और यहाँ की हर नेकी अक़ताए आलम में की गई नेकियों से एक लाख गुना ज़्यादा बेहतर है। यह मक़ाम इस क़दर मोहतरम और पुर अम्न है कि यहाँ न सिर्फ़ ख़ूनरेज़ी मना है बल्कि न किसी जानवर का शिकार किया जा सकता है व किसी पेड़ को काटा और सबज़े और पौधे को उखाडा़ जा सकता है।
क़ुरआने पाक में उसे बैतुल हराम यानी शौकत का घर कहा गया है। ख़ान ए काबा के महल्ले वुक़ू के बारे में लिखा गया है कि यह ऐन अरशे इलाही और बैतुल मामूर के नीचे है। इल्मे जुग़राफ़िया के माहिरीन का कहना है कि काबे के महल्ले वुक़ू को हम नाफ़े ज़मीन कह सकते हैं।

Tuesday, August 28, 2012

हिन्दुस्तान की आजादी में इस्लाम का योगदान

हिन्दुस्तान की आजादी में इस्लाम का योगदान 

जो लोग ये सोचते हें की देश को आजाद करने के लिए मुसलमानों का कोई हाथ नहीं।पुरे हिंदुस्तान  को गैर मुस्लिमो ने हि आजाद कराया है , मे उन लोगो को इस्लाम के बलिदान के बारे बताता हूँ।
हिन्दुस्थान को आजाद कराने के लिए अगर किसी ने जिम्मा उठाया वो एक मुस्लिम था।नाम था मजनू शाह मलंगइन्होने अंग्रेजो के खिलाफ जंग का  एलान  सन-1761 में लड़ी  इस जंग 'उदुअनाला की जंग 'के नाम से जाना जाता है।इन्होने  'बक्सर  की जंग ' सन-1764 में लड़ी।
पर देश के ही कुछ महान  आदमियों ने उनके नाम को फाइलों में दबा दिया।
इसका यह नतीजा निकला की लोग उनके नाम को भूल चुके है। उनके बारे में बताने का कुछ पर्यत्न करता हूँ।
 मजनू शाह मलंग 
                        मजनू  शाह मलंग एक सन्यासी फकीर के रूप में जाना जाता है।
मजनू शाह मलंग का दूसरा नाम 'अबु तालिब 'था।उनके मलंग बनने के बाद लोग उन्हें मजनू मलंग तथा मजनू शाह बुरहान के नाम से जानने लगे।उनका मदारगंज में उनका अस्थाई निवास था।मजनू शाह बोगरा जिले बलियाकांदी में भी रहते थे।इन्होने सबसे पहले हिंदुस्तान को आजाद कराने जिम्मा उठाया।इन्होने कोमी एकता पर बल दिया।मजनू मलंग ने हिन्दू  सन्यासियों और मुस्लिम लोगों को इकट्टा किया और अंग्रेजो से लड़ने के लिए प्रेरित किया।जब साडी जनता इकट्ठी हो गयी तो उन्होंने मजनू शाह के नेतृत्व में जंग लड़ने का फेसला किया।उनका मुख्यालय कानपूर के पास मकनपुर में था।
25 फरवरी 1771 में इनकी जंग ब्रिटिस सरकार से हुई,उस समय ब्रिटिस सरकार का नेतृत्व लेफ्टिनेंट फेल्थम कर रहा था।यह जंग असफल रही। 
इनकी दूसरी जंग 23 दिसम्बर 1773 में हुइ।यह जंग भी असफल रही।
8 दिसम्बर 1786 की लड़ाई में मजनू शाह मलंग घायल हो गए।मजनू शाह मलंग इस जंग के बाद मकनपुर चले गए।माना जाता हे की 1787में मजनू शाह मलंग का इंतकाल हो गया।
उनके इंतकाल के बाद उनके भतीजे मुषा शाह ने उनकी जगह नेतृत्व किया।1792 में हुई अंग्रेजो के साथ जंग में वो सहीद हो गए।